Skip to main content

उत्कृष्ट कर्तव्य निर्वहन हेतु मन का प्रबंधन जरूरी : अवधेश प्रताप सिंह, प्रमुख सचिव, विधानसभा मध्यप्रदेश

🙏 द्वारा, राधेश्याम चौऋषिया 🙏

भोपाल । प्रशासक, प्रबंधक एवं कार्यपालकों हेतु ब्रह्मकुमारी राजयोग फाउण्डेनशन, प्रशासक प्रभाग द्वारा भोपाल में आयोजित मध्य‍ प्रदेश राज्य स्तरीय स्वर्णिम प्रशासन जागृति अभियान के समापन समारोह के अवसर पर श्री अवधेश प्रताप सिंह, प्रमुख सचिव, मध्यप्रदेश विधान सभा द्वारा उल्लेख किया गया कि, हम सब परिवार के स्तर पर, समाज में, अपने व्यवसाय या व्यापार में प्रशासक एवं प्रबंधक की भूमिका में रहते हैं। वर्तमान प्रदूषित वातावरण में शासन-प्रशासन में कार्यरत प्रशासक एवं कार्यपालकों को अनेक दबाव, प्रभाव एवं तनाव का सामना करना पड़ता है। कतिपय बार चुनौतीपूर्ण स्थिति में निर्णय लेकर कर्तव्य का निर्वहन करना होता है। ऐसी स्थिति में यदि प्रशासक, प्रबंधक या कार्यपा‍लक का मन संतुलित है, तो वह सही ढंग से बुद्धि का उपयोग कर निर्णय लेकर अपना कर्तव्य का पालन श्रेष्ठ तरीके से पूरा कर सकता है। महाभारत में अर्जुन का मन विचलित होने पर ही श्री कृष्ण ने गीता के माध्यतम से ज्ञान देकर कर्तव्य निर्वहन हेतु तैयार किया था। 

प्रमुख सचिव श्री सिंह ने कहा कि, मन की भूमिका व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण होती है। इसलिए कहा गया है कि, - ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’, लेकिन मन को सशक्त बनाने के लिए आध्यात्म की आवश्यकता होती है। हमारे मन में अधिकांशत: नकारात्मतक या व्यर्थ के संकल्प या विचार चलते हैं, जबकि सकारात्मक या अच्छे विचार ही जीवन निर्वहन के लिए उपयोगी होते हैं। इसलिए व्यर्थ और नकारात्मक विचार से बचने हेतु आध्यात्म के माध्यम से आं‍तरिक शक्तियों को सशक्त कर मन का प्रबंधन किया जा सकता है। 

मध्यप्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव श्री अवधेश प्रताप सिंह जी ने स्वयं के मेडीटेशन करने का उदाहरण देते हुए बताया कि, इसमें राजयोग मेडिटेशन काफी उपयोगी रहता है, जिसमें व्यक्ति सभी शक्तियों के स्त्रोत परमात्मा से आत्मा का सम्बन्ध जोड़कर अपनी आंतरिक शक्तियों को मजबूत कर सकता है। वर्तमान में दैवीय उपासना का पर्व नवरात्रि प्रारंभ हुआ है। इसमें भी हम उपासना के माध्यम से शरीर के साथ संयम व साधना से अपने मन को भी सशक्त बना सकते हैं, जिससे जीवन के हर क्षेत्र में श्रेष्ठ ढंग से कर्तव्य निर्वहन किया जा सकता है। 

उल्लेखनीय है कि, ब्रह्मकुमारी विश्व विद्यालय के प्रशासक प्रभाग द्वारा 5 माह पूर्व को स्वर्णिम प्रशासन जागृति अभियान माननीय राज्यपाल महोदय के कर कमलों से शुभारम्भ कर 30 मार्च, 2025 तक प्रदेश के जिलों, तहसीलों में कार्यक्रम आयोजित किये गये, जिसमें 4 हजार से अधिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा लाभ प्राप्त किया गया। 

 इस समारोह को राजयोगी बी.के.हरीश भाई (मुख्यालय संयोजक), प्रशासक प्रभाग माउण्ट आबू, राजयोगिनी ब्रह्मकुमारी अवधेश दीदी (राष्ट्रीय  संयोजक), श्रीमती मालती राय (महापौर), श्री हरिनारायण चारी (पुलिस आयुक्त‍), श्रीमती भावना वालिम्बेय (IAS) आदि के द्वारा भी संबोधित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्रशासक, प्रबंधक, गणमान्य  जन उपस्थित थे।

✍ राधेश्याम चौऋषिया 

Radheshyam Chourasiya

Radheshyam Chourasiya II

● सम्पादक, बेख़बरों की खबर
● राज्य स्तरीय अधिमान्य पत्रकार, जनसम्पर्क विभाग, मध्यप्रदेश शासन
● राज्य मीडिया प्रभारी, भारत स्काउट एवं गाइड मध्यप्रदेश
● मध्यप्रदेश ब्यूरों प्रमुख, दैनिक निर्णायक
● मध्यप्रदेश ब्यूरों प्रमुख, दैनिक मालव क्रान्ति

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

"बेख़बरों की खबर" फेसबुक पेज...👇

Bekhabaron Ki Khabar - बेख़बरों की खबर

"बेख़बरों की खबर" न्यूज़ पोर्टल/वेबसाइट... 👇

https://www.bkknews.page

"बेख़बरों की खबर" ई-मैगजीन पढ़ने के लिए नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करें...👇https://www.readwhere.com/publi.../6480/Bekhabaron-Ki-Khabar

🚩🚩🚩🚩 आभार, धन्यवाद, सादर प्रणाम। 🚩🚩🚩🚩

Comments

मध्यप्रदेश समाचार

देश समाचार

Popular posts from this blog

आधे अधूरे - मोहन राकेश : पाठ और समीक्षाएँ | मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे : मध्यवर्गीय जीवन के बीच स्त्री पुरुष सम्बन्धों का रूपायन

  आधे अधूरे - मोहन राकेश : पीडीएफ और समीक्षाएँ |  Adhe Adhure - Mohan Rakesh : pdf & Reviews मोहन राकेश और उनका आधे अधूरे - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न नाट्य लेखक और कथाकार मोहन राकेश का जन्म  8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में  हुआ। उन्होंने  पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए उपाधि अर्जित की थी। उनकी नाट्य त्रयी -  आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे भारतीय नाट्य साहित्य की उपलब्धि के रूप में मान्य हैं।   उनके उपन्यास और  कहानियों में एक निरंतर विकास मिलता है, जिससे वे आधुनिक मनुष्य की नियति के निकट से निकटतर आते गए हैं।  उनकी खूबी यह थी कि वे कथा-शिल्प के महारथी थे और उनकी भाषा में गज़ब का सधाव ही नहीं, एक शास्त्रीय अनुशासन भी है। कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि शहरी मध्य वर्ग है। कुछ कहानियों में भारत-विभाजन की पीड़ा बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त हुई है।  मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती ...

खाटू नरेश श्री श्याम बाबा की पूरी कहानी | Khatu Shyam ji | Jai Shree Shyam | Veer Barbarik Katha |

संक्षेप में श्री मोरवीनंदन श्री श्याम देव कथा ( स्कंद्पुराणोक्त - श्री वेद व्यास जी द्वारा विरचित) !! !! जय जय मोरवीनंदन, जय श्री श्याम !! !! !! खाटू वाले बाबा, जय श्री श्याम !! 'श्री मोरवीनंदन खाटू श्याम चरित्र'' एवं हम सभी श्याम प्रेमियों ' का कर्तव्य है कि श्री श्याम प्रभु खाटूवाले की सुकीर्ति एवं यश का गायन भावों के माध्यम से सभी श्री श्याम प्रेमियों के लिए करते रहे, एवं श्री मोरवीनंदन बाबा श्याम की वह शास्त्र सम्मत दिव्यकथा एवं चरित्र सभी श्री श्याम प्रेमियों तक पहुंचे, जिसे स्वयं श्री वेद व्यास जी ने स्कन्द पुराण के "माहेश्वर खंड के अंतर्गत द्वितीय उपखंड 'कौमारिक खंड'" में सुविस्तार पूर्वक बहुत ही आलौकिक ढंग से वर्णन किया है... वैसे तो, आज के इस युग में श्री मोरवीनन्दन श्यामधणी श्री खाटूवाले श्याम बाबा का नाम कौन नहीं जानता होगा... आज केवल भारत में ही नहीं अपितु समूचे विश्व के भारतीय परिवार ने श्री श्याम जी के चमत्कारों को अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से देख लिया हैं.... आज पुरे भारत के सभी शहरों एवं गावों में श्री श्याम जी से सम्बंधित संस्थाओं...

दुर्गादास राठौड़ : जिण पल दुर्गो जलमियो धन बा मांझल रात - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

अमरवीर दुर्गादास राठौड़ : जिण पल दुर्गो जलमियो धन बा मांझल रात। - प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा माई ऐड़ा पूत जण, जेहड़ा दुरगादास। मार मंडासो थामियो, बिण थम्बा आकास।। आठ पहर चौसठ घड़ी घुड़ले ऊपर वास। सैल अणी हूँ सेंकतो बाटी दुर्गादास।। भारत भूमि के पुण्य प्रतापी वीरों में दुर्गादास राठौड़ (13 अगस्त 1638 – 22 नवम्बर 1718)  के नाम-रूप का स्मरण आते ही अपूर्व रोमांच भर आता है। भारतीय इतिहास का एक ऐसा अमर वीर, जो स्वदेशाभिमान और स्वाधीनता का पर्याय है, जो प्रलोभन और पलायन से परे प्रतिकार और उत्सर्ग को अपने जीवन की सार्थकता मानता है। दुर्गादास राठौड़ सही अर्थों में राष्ट्र परायणता के पूरे इतिहास में अनन्य, अनोखे हैं। इसीलिए लोक कण्ठ पर यह बार बार दोहराया जाता है कि हे माताओ! तुम्हारी कोख से दुर्गादास जैसा पुत्र जन्मे, जिसने अकेले बिना खम्भों के मात्र अपनी पगड़ी की गेंडुरी (बोझ उठाने के लिए सिर पर रखी जाने वाली गोल गद्देदार वस्तु) पर आकाश को अपने सिर पर थाम लिया था। या फिर लोक उस दुर्गादास को याद करता है, जो राजमहलों में नहीं,  वरन् आठों पहर और चौंसठ घड़ी घोड़े पर वास करता है और उस पर ही बैठकर बाट...