लोक ही समाज और साहित्य की अस्मिता है - प्रो. शैलेन्द्र शर्मा Ujjain | साहित्य का लोकवृत्त मानव सभ्यता की पहचान कराता है। उसके दायरे में मानव समाज की गति - प्रगति का प्रत्येक चरण अंकित होता है। लोक ही साहित्य और समाज की अस्मिता है। लोक की पहचान के बगैर समाज का अस्तित्व अधूरा है। सम्पूर्ण भारत की लोक संवेदना एक जैसी है। कवि में लोकवृत्त के निरीक्षण और अनुशीलन से, शास्त्रों के अध्ययन करने से प्रवीणता या पैनापन स्वयमेव उद्भासित होने लगता है। यह बात सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक एवं लोक संस्कृतिविद् प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कही। वे निराला जयंती और बसंत पंचमी के उपलक्ष्य में आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में लिखित लोक साहित्य का स्वर पूरे राष्ट्र में एक सा सुनाई पड़ता है। उसका भावबोध भारतीयता की संकल्पना में रचा-बसा है। उसकी प्रकृति पूरे राष्ट्र में एक चेतना से परिचालित है। निराला का साहित्य हमारे लोक की चेतना का साहित्य है। उन्होंने लोक के अनेक रूपों का जीवंत चित्रण किया है। हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकड...