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मालव सुत पं सूर्यनारायण व्यास - सम्पादक हरीश निगम, डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा, डॉ हरीश प्रधान
May 24, 2020 • BKK NEWS - बी.के.के. न्यूज़ (सम्पादक - राधेश्याम चौऋषिया) • विशेष आलेख

पं सूर्यनारायण व्यास के विलक्षण अवदान को सहेजती एक पुस्तक 

पुण्यश्लोक पं सूर्यनारायण व्यास ( 2 मार्च 1902 ई. - 22 जून 1976 ई.) विलक्षण व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे साथ कई रूपों - प्राच्यविद्या विद्, साहित्य मनीषी, इतिहासकार, सर्जक, पत्रकार, ज्योतिर्विद् और राष्ट्रीय आंदोलन के अनन्य स्तम्भ के रूप में सक्रिय रहे। महाकालेश्वर के समीपस्थ उनका निवास भारती भवन क्रांतिकारियों से लेकर संस्कृतिकर्मियों की गतिविधियों का केंद्र रहा। पं व्यास जी के विविधायामी अवदान पर केंद्रित महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘मालव सुत पं सूर्यनारायण व्यास’ साहित्यकार श्री हरीश निगम, डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा एवं डॉ हरीश प्रधान के सम्पादन में प्रकाशित हुई थी।
 
लोकमानस अकादमी एवं साँझी पत्रिका द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के प्रथम खंड में पंडित सूर्यनारायण व्यास के व्यक्तित्व और विविधमुखी अवदान पर केंद्रित महत्वपूर्ण आलेखों का समावेश किया गया है। इस खंड के प्रमुख लेखक हैं -  कविवर डॉ शिवमंगल सिंह सुमन, पुरातत्त्ववेत्ता श्री विष्णु श्रीधर वाकणकर, आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी, श्री परिपूर्णानंद वर्मा, आचार्य श्रीनिवास रथ, श्री बालकवि बैरागी, डॉ प्रभाकर श्रोत्रिय, पंडित व्यास के सुपुत्र श्री राजशेखर व्यास, डॉ भगवतीलाल राजपुरोहित, आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी, डॉ बसंतीलाल बम, डॉ प्रहलादचंद्र जोशी, डॉ शिव चौरसिया, इब्बार रब्बी, श्री हरीश निगम, डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा, श्री मोहन सोनी, डॉ जगदीश चंद्र शर्मा, श्री परमात्मानंद पांडेय, श्री रमेश निर्मल, प्रो कलानिधि चंचल, डॉ रश्मिकांत व्यास, श्री राजपाल आर्य, शिवनारायण उपाध्याय शिव, अभिमन्यु डिब्बेवाला, डॉ विवेक चौरसिया आदि। 
 
दूसरे खंड में पंडित व्यास की कुछ प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन है। इनमें उनके चर्चित व्यंग्य आंखों देखी अपनी मौत, मूर्ति का मसला, अपनी आत्मकथा लिखना चाहता हूं - - - पर, कविता यह हिमशैल हमारा है आदि का समावेश किया गया है। इस खंड से स्पष्ट दिखाई देता है कि दशकों पहले हिंदी व्यंग्य को समर्थ बनाने में पं व्यास जी के प्रयत्न आज रंग ला रहे हैं। 
 
शैलेंद्रकुमार शर्मा की पुस्तक मालव सुत पं सूर्यनारायण व्यास Book of Shailendra Kumar Sharma 

 

अनवरत यात्रा : सूर्योदय से सूर्यास्त तक के माध्यम से डॉ प्रभाकर श्रोत्रिय एवं श्री राजशेखर व्यास ने पंडित व्यास जी की जीवन यात्रा के पड़ावों और उनके अवदान का रूपांकन किया है। श्री राजशेखर व्यास ने अपने लेख एक पत्र जिसने एक शहर बनाया के माध्यम से पंडित जी द्वारा स्थापित एवं संपादित मासिक पत्र विक्रम के अवदान की चर्चा की है। उन्होंने लिखा है, जी हां, विक्रम नाम से सुशोभित यह मासिक पत्र उज्जैन से प्रकाशित हुआ था और न केवल प्रकाशित हुआ था, अपितु तत्कालीन मासिक सरस्वती, चांद, माधुरी, हंस, विश्वमित्र के स्तर से विक्रम का कोई भी अंक उन्नीस नहीं होता था। विक्रम के जन्म का श्रेय स्वर्गीय पांडेय बेचन शर्मा उग्र को दिया जाता है, जो 1942 में उज्जयिनी के भास्कर स्वर्गीय पंडित सूर्यनारायण व्यास के आवास भारती भवन में आकर ठहरे थे। उज्जैन उनको भा गया था। व्यास जी के एक मित्र सुपरिचित कन्हैयालाल चौरसिया का प्रेस था। चौरसिया जी प्रायः भारती भवन आते रहते थे। एक रोज अचानक पत्र की चर्चा चल पड़ी। वार्तालाप के दौरान चौरसिया जी उग्र जी से बहुत प्रभावित हुए और पत्र निकालने को राजी हो गए। व्यास जी संरक्षक बने, संपादक उग्र जी एवं संचालक चौरसिया जी बने और इस तरह अप्रैल 1942 को प्रथम अंक का प्रकाशन हुआ। इस लेख में श्री राजशेखर व्यास ने विक्रम में पं व्यास जी के सोलह पृष्ठीय संपादकीय की चर्चा की है, वहीं इस पत्र के संघर्षों, प्रेरणाओं और योगदान को बड़ी मार्मिकता से उद्घाटित किया है। 
 
प्रख्यात कवि डॉ शिवमंगल सिंह सुमन ने अपने लेख पुण्यश्लोक  प्रियदर्शी पंडित सूर्यनारायण व्यास  में पंडित व्यास की बहुमुखी प्रतिभा की चर्चा की है। उन्होंने ठीक ही लिखा है, जैसे जैसे समय बीत रहा है, लगता है कि व्यास जी के बिना उज्जयिनी की कल्पना नहीं की जा सकती। इस पुण्यतीर्थ के वे प्रबुद्ध प्रचेतस थे, रामझरोखे में बैठकर हरसिद्धि प्राप्ति में आने वालों का दर्शन करने वाले। मालव भूमि के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का ऐसा एक प्रहरी सदियों बाद अवतरित हुआ था। आज का विक्रम विश्वविद्यालय, विक्रम कीर्ति मंदिर और कालिदास स्मृति मंदिर के अप्रतिहत अनुष्ठान के प्रतीक हैं। कौन जान पाएगा कि  अवंती जनपद के स्वर्णिम अतीत को वर्तमान में ढालने के उसने क्या-क्या सपने संजोए थे।  प्रथम अखिल भारतीय कालिदास समारोह के ऐतिहासिक अधिवेशन का पुण्य पर्व आज भी प्रभात के सपने की स्मृति में सजीव बना हुआ है। पुष्यमित्र शुंग के बाद शायद ही ऐसी यज्ञ की वेदी इस भूमि में अवतरित हुई हो। अद्भुत दृश्य था, जब भारत का चक्रवर्ती सम्राट राष्ट्रपति राजेंद्रप्रसाद अपनी गरिमा के समस्त विधि - विधानों को भूलकर महर्षि व्यास की पीठ को नमन करने पहुंच गया था। 
 
पद्मश्री विष्णु श्रीधर वाकणकर ने व्यास जी : अनेक मुखड़े - सभी उज्जवल निबन्ध के माध्यम से उनके जीवन के महत्त्वपूर्ण पक्षों पर प्रकाश डाला है। आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी ने पंडित व्यास से जुड़े कुछ भीगे संस्मरण प्रस्तुत किए हैं। आचार्य श्रीनिवास रथ, डॉ बसंतीलाल बम,  डॉ भगवतीलाल राजपुरोहित, प्रो कलानिधि चंचल, डॉ प्रह्लादचंद्र जोशी, श्री परिपूर्णानंद वर्मा, बालकवि बैरागी, आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी आदि ने व्यास जी के बहुआयामी व्यक्तित्व, कृतित्व और संस्मरणों को अपने आलेखों में प्रस्तुत किया है। मालवी कवि श्री हरीश निगम ने मालवी भाषा और साहित्य के उन्नायक के रूप में पंडित व्यास के योगदान की चर्चा की है। डॉक्टर जगदीश चंद्र शर्मा ने पंडित व्यास के व्यंग्य विनोद लेखन के वैशिष्ट्य पर प्रकाश डाला है।
 
पुस्तक के संपादक डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा ने मालवा की पत्रकारिता और विक्रम संपादक पंडित सूर्यनारायण व्यास  आलेख के माध्यम से  पंडित व्यास के  पत्रकारिता  कर्म  पर सविस्तार प्रकाश डाला है। डॉ शर्मा के अनुसार यद्यपि भारत में पत्रकारिता का आगमन पश्चिम की देन है, किंतु शीघ्र ही यह सैकड़ों वर्षों की निद्रा में सोये भारत की जाग्रति का माध्यम सिद्ध हुई। विश्वजनीन सूचना-संचार के इस विलक्षण माध्यम ने पिछली दो शताब्दियों में अद्भुत प्रगति की है। वहीं भारतीय परिदृश्य में देखें, तो हमारी जातीय चेतना के अभ्युदय, आधुनिक विश्व के साथ हमकदमी, स्वातंत्र्य की उपलब्धि और राजनैतिक-सामाजिक चेतना के प्रसार में हिन्दी पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है। पत्रकारिता और साहित्य की परस्परावलंबी भूमिका और दोनों की समाज के प्रतिबिम्ब के रूप में स्वीकार्यता आधुनिक भारत का अभिलक्षण बन कर उभरी है, तो उसके पीछे जो स्पष्ट कारण नज़र आता है, वह है महनीय व्यक्तित्वों की साहित्य एवं पत्रकारिता के बीच स्वाभाविक चहलकदमी। ऐसे साहित्यिकों की सुदीर्घ परम्परा में विविधायामी कृतित्व के पर्याय पद्मभूषण पं. सूर्यनारायण व्यास (1902 - 1976 ई.) का नाम अविस्मरणीय है, जिन्होंने देश के हृदय अंचल ‘मालवा’ की पुरातन और गौरवमयी नगरी उज्जैन से ‘विक्रम’ मासिक के सम्पादन-प्रकाशन के माध्यम से पत्रकारिता की ऊर्जा को समर्थ ढंग से रेखांकित किया। पं व्यास की पत्रकारिता की उपलब्धि अपने नगर, अंचल और राष्ट्र के पुनर्जागरण और सांस्कृतिक अभ्युदय से लेकर हिन्दी पत्रकारिता को नए तेवर, नई भाषा और नए औजारों से लैस करने में दिखाई देती है, जहाँ पहुँचकर राजनीति, साहित्य, संस्कृति और पत्रकारिता के बीच की भेदक रेखाएँ समाप्त हो गईं। लगभग छह दशक पहले मालवा की हिन्दी पत्रकारिता के खास स्वभाव को गढ़ने से लेकर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में आज उसकी अलग पहचान को निर्धारित करवाने में पं. व्यासजी और उनके ‘विक्रम’ की विशिष्ट भूमिका रही है।
 
डॉ शिव चौरसिया, शिवनारायण उपाध्याय शिव, अभिमन्यु डिब्बेवाला और मोहन सोनी ने अपनी कविताओं के माध्यम से पंडित व्यास जी को काव्यांजलि दी है। इस पुस्तक में श्री राजशेखर व्यास द्वारा उपलब्ध करवाए गए पं व्यास जी के अनेक दुर्लभ चित्र संजोए गए हैं। वस्तुतः व्यास जी की जन्मशती पर विविध प्रकल्पों के माध्यम से प्रसिद्ध लेखक और मीडिया विशेषज्ञ पं राजशेखर व्यास ने पितृ ऋण से अधिक राष्ट्र ऋण चुकाने का कार्य किया था। पण्डित व्यास जी के सम्बंध में ठीक ही कहा जाता है कि उनके जैसे वे ही थे। 
 
पुस्तक: मालव सुत पं सूर्यनारायण व्यास
सम्पादक: श्री हरीश निगम, डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा एवं डॉ. हरीश प्रधान
प्रकाशक: लोक मानस अकादेमी एवम् साँझी पत्रिका

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